Home Politics मंदिर तोड़कर मंदिर जाने वालों को क्या राजस्थान की जनता माफ करेगी?

    मंदिर तोड़कर मंदिर जाने वालों को क्या राजस्थान की जनता माफ करेगी?

    अपनी राजनीति चमकाने के लिए इस तरह धार्मिक स्थलों का भ्रमण न सिर्फ नैतिकता बल्कि लोकतांत्रिक दृष्टि से भी ठीक नहीं

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    राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ‘राजस्थान गौरव यात्रा’ के नाम से आयोजित अपनी चुनावी यात्रा पर निकल चुकी हैं. उन्होंने इसकी शुरुआत राजसमंद जिले के चारभुजा मंदिर में दर्शन कर की है. राजे की इस चुनावी यात्रा की योजना के साथ ही कई विवाद भी जुड़ गए जिनके चलते इस यात्रा के नाम से लेकर इसके समय तक, हर बात कई बार बदली गई. दरअसल मुख्यमंत्री राजे, राजस्थान गौरव यात्रा को कुछ महीनों पहले निकलवाना चाहती थीं ताकि विधानसभा चुनावों से पहले वे ज्यादा से ज्यादा क्षेत्रों को छूने के साथ समय रहते वहां से फीडबैक ले सकें. लेकिन करीब तीन महीने तक पार्टी प्रदेशाध्यक्ष को लेकर चली राजे और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के बीच की रस्साकशी में यह यात्रा भी टल गई और इस दौरान राजस्थान भाजपा को बिना मुखिया के किसी अनाथ की तरह रहना पड़ा, सो अलग.

    यदि इस यात्रा के नाम की बात करें तो सूत्रों का कहना है कि पहले इसका नाम राजे की पिछली बार की तरह ‘सुराज यात्रा’ ही रखा जाना तय था. लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा बार-बार इसे ‘कुराज यात्रा’ कहने पर भाजपा ने इसका नाम बदलने में भी खैर समझी. तब पार्टी के थिंकटैंक कहे जाने वाले लोगों ने इस यात्रा का नाम राजस्थान गौरव यात्रा रखना तय किया. लेकिन पार्टी के बाग़ी नेता और विधायक घनश्याम तिवाड़ी ने प्रदेश भाजपा पर इस नाम को चोरी करने का आरोप लगाया. तिवारी का कहना है कि हाल ही में गठित की गई उनकी पार्टी ‘दीनदयाल वाहिनी’ इस नाम से राजस्थान में चुनावी यात्रा करने वाली थी. लेकिन भाजपा ने यह नाम हड़प लिया.

    बहरहाल, जैसे-तैसे कथित तौर पर चोरी के नाम के साथ भाजपा की यात्रा शुरु तो हुई. लेकिन इसकी शुरुआत में ही मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को भीड़ के आक्रोश का सामना करना पड़ गया. दरअसल जब राजे का यह चुनावी रथ नाथद्वारा से गोगुंदा की तरफ बढ़ने लगा तो रास्ते में आने वाले कुछ गांव के लोगों ने राजे का विरोध करते हुए कांग्रेस के समर्थन में जमकर नारे लगाए. हालांकि भारी पुलिस जाब्ते के चलते ये नाराज ग्रामीण मुख्यमंत्री के रथ के नजदीक तो नहीं पहुंच सके. लेकिन अपनी मुखालफत करते ये नारे राजे को कुछ रास नहीं आए और वे रथनुमा गाड़ी के अंदर चली गईं.

    जब द एंगल ने इन ग्रामीणों से बातचीत की तो पता चला कि वे लोग प्रदेश सरकार के दोहरेपन से आक्रोशित थे. उनमें से एक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि पूरे चार साल मुख्यमंत्री राजे को जनता की सुध नहीं आई. लेकिन चुनावों से चार महीने पहले राजस्थान गौरव यात्रा के नाम पर वे लोगों को बेवकूफ बनाना चाहती हैं. वहीं राजे के खिलाफ नारे लगाने वाले एक युवा का कहना था कि एक तरफ ये सरकार लोगों की भावनाओं के खिलाफ जाकर सैंकड़ों मंदिरों पर जेसीबी चलवाती है. और चुनावों में खुद को हिंदुओं का हितैषी दिखाने के लिए मंदिरों में जाने का ढोंग करती है. इस युवा का इशारा जयपुर में मेट्रो के नाम पर तोड़े गए करीब डेढ़ सौ छोटे-बड़े मंदिरों की तरफ था.

    जयपुर में मेट्रो के लिए मंदिरों पर जेसीबी चलते हुए

    जानकार बताते हैं कि यदि राजे सरकार चाहती तो आसानी से लोगों के श्रद्धाकेंद्र स्वरूप इन मंदिरों को बचाया जा सकता था. लेकिन अपनी थोड़ी सी मशक्कत बचाने के लिए सरकार ने ऐसा नहीं किया. लिहाजा प्रदेशभर के श्रद्धालुओं के मन में राजे सरकार के प्रति गहरा आक्रोश बना हुआ है. तोड़े गए प्रमुख मंदिरों में भगवान शिव का रोजगारेश्वर मंदिर भी शामिल था. बड़ी चौपड़ के निवासी मोहन शर्मा बताते हैं कि बचपन से ही वे श्रावण के हर सोमवार को रोजगारेश्वर मंदिर में जाया करते थे. वे उस मंदिर के साथ न सिर्फ भक्ति बल्कि भावनात्मक तौर पर भी जुड़ाव महसूस करते थे. लेकिन वसुंधरा सरकार ने उस मंदिर पर जेसीबी चलवाकर न सिर्फ उनकी श्रद्धा बल्कि जिंदगीभर की यादों को भी चकनाचूर कर दिया. अपना रोष ज़ाहिर करते हुए शर्मा का कहना है कि न सिर्फ वे खुद वसुंधरा सरकार के खिलाफ वोट देंगे बल्कि दूसरे लोगों को भी इसके लिए तैयार करेंगे.

     

    परकोटे में स्थित रोजगारेश्वर मंदिर को ढहाते हुए

    ये कहानी सिर्फ मोहन शर्मा की नहीं है. जयपुर परकोटे के अंदर आपको सैंकड़ों-हजारों की संख्या में वे श्रद्धालु मिल जाएंगे जो अपने-अपने अराध्यों के मंदिरों के तोड़े जाने से भाजपा सरकार से बेहद नाराज हैं. जब ये मंदिर तोड़े गए थे तब मामले की गंभीरता को देखते हुए भाजपा के पितृ-संगठन माने जाने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) को प्रदेशव्यापी चक्काजाम का आह्वान करना पड़ा. लेकिन सत्ता के मद में अंधी इस सरकार के कानों जूं नहीं रेंगी.

    ऐसा ही कुछ हाल इस सरकार का हिंदुओं की श्रद्धा के एक अन्य केंद्र गायों के मामले में भी रहा. एक राजे सरकार गायों की रक्षा के नाम पर मासूम लोगों का क़त्ल करने वाले लोगों को प्रोत्साहन देती रही, वहीं दूसरी तरफ चारे-पानी के अभाव में पिछले साढ़े चार साल में हजारों गायों ने गौशालाओं में दम तोड़ दिया. ताजा मामला मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के गृहजिले झालावाड़ से जुड़ा है. वहां पिछले सप्ताह ही चांदखेड़ी कृष्णानंद गौशाला में अव्यवस्थाओं के चलते तीन दिन में बारह गायों ने दम तोड़ दिया. और कोई गौभक्त सामने नहीं आया. लेकिन यह पहली बार नहीं था जब गायों की परम रक्षक होने का दावा करने वाली इस सरकार के कार्यकाल में गायों की तड़प-तड़प कर मौत हुई हो.

    अगस्त-2016 में राजधानी जयपुर की हिंगोनिया गोशाला में हजारों गायों के मरने की खबर ने न सिर्फ प्रदेश बल्कि पूरे देश को झकझोर कर रख दिया. वहां हालात इतने बुरे थे कि चारे-पानी और इलाज के अभाव में एक-एक दिन में सौ-सौ गायों ने दम तोड़ा था. हिंगोनिया की तरह उदयुपर की सरकारी गोशाला में भी प्रशासन की अनदेखी के चलते सैंकड़ों गायों की भी मौत हो गई थी. इसके बाद पिछले साल आई भीषण बरसात के बाद उचित तीमरदारी के अभाव में जालोर में स्थित देश की सबसे बड़ी गोशाला मानी जाने वाली पथमेड़ा और उसकी शाखाओं में सैंकड़ों गायों ने दम तोड़ दिया.

    हिंगोनिया गौशाला से मृत गायों को ट्रेक्टर में भरकर ले जाते हुए

    गायों की मौत का सिलसिला यहीं नहीं रुका. पिछले साल जुलाई में सिरोही जिले की इकलौती सरकारी अर्बुदा गौशाला में सात दिन में 20 गायों की मौत की ख़बरें सामने आई थी. इसे गायों का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि यह गौशाला राज्य के गौपालन राज्य मंत्री ओटाराम देवासी के विधानसभा क्षेत्र में आती है. इसी तरह बूंदी जिले की चारभुजानाथ गौशाला में अव्यवस्थाओं के चलते इसी साल अप्रैल में एक सप्ताह के दौरान 20 से ज्यादा गायों की मौत हो गयी. स्थानीय लोगों का आरोप है कि चारे और पानी की उचित व्यवस्था के अभाव में कमजोरी के चलते गायों ने दम तोड़ दिया. हालांकि गौशाला के कर्मचारियों ने इसके लिए दूषित खाने को कारण बताकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया.

    कल्पना कीजिए कि यदि इतने मंदिर कांग्रेस के राज में तोड़ दिए जाते या फिर तब इतनी गायों की मौत बुनियादी सुविधाओं के अभावों में हो जाती तो भाजपा पूरे राजस्थान के अमन-चैन को किस हद तक प्रभावित कर सकती थी. हमसे हुई बातचीत में राजस्थान की राजनीति को लंबे समय से देख रहे एक विश्लेषक का कहना है कि अपने कार्यकाल में हिंदुओं की श्रद्धा को कदम-कदम पर अपमानित करने वाली मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे न जाने किस मुंह से मंदिरों की सीढ़ियां चढ़ती हैं. उन्हें तो नैतिकता के नाते मंदिरों में नहीं जाना चाहिए.

    अपनी राजनीति चमकाने के लिए इस तरह धार्मिक स्थलों का भ्रमण न सिर्फ नैतिक बल्कि लोकतांत्रिक दृष्टि से भी ठीक नहीं

    यह किसी से नहीं छिपा है कि राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय जनता पार्टी ने अपने राजनैतिक उदभव के लिए धर्म को एक बड़े हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया है. जो बदस्तूर अभी तक ज़ारी है. राजस्थान भी इससे अछूता नहीं रहा. यदि वसुंधरा राजे की ही बात करें तो 2003 के विधानसभा चुनावों के बाद वे पहली बार मुख्यमंत्री बनीं थीं तो नवनिर्मित विधानसभा के सामने आयोजित शपथ ग्रहण समारोह, सरकारी कम और एक धार्मिक आयोजन ज्यादा लग रहा था. एक सांवैधानिक पद पर रहते हुए मुख्यमंत्री ने धर्म आधारित राजनीति को चमकाने के लिए घोर अंधविश्वास को जमकर बढ़ावा दिया. पदग्रहण करने से पहले अपनी कुर्सी की पूजा करवाना इसका एक छोटा सा उदहारण मात्र है. जब मुख्यमंत्री ही इस रास्ते पर चल पड़ीं थीं तो मंत्री भला कहां पीछे रहने वाले थे. उन्होंने भी अपने कमरों को अंक ज्योतिषों से पूछ-पूछ कर निर्धारित किए. हमारे धर्मनिरपेक्ष देश में यह पहली बार हो रहा था.

    यहां हमारा उद्देश्य किसी की आस्था पर सवाल उठाने का नहीं है. लेकिन राजस्थान का प्रत्येक संवेदनशील नागरिक इस बात को बखूबी समझता है कि भारत के संविधान ने मूल कर्तव्यों और नीति निदेशक तत्वों के मार्फत नागरिकों और सरकारों को देश में वैज्ञानिक सोच और शिक्षा को बढ़ावा देने निर्देश दिए हैं. लेकिन राजस्थान में वसुंधरा सरकार ने शायद इस बात को सिरे से भुला दिया. इतिहास और वर्तमान गवाह है कि दुनियाभर के वे तमाम नेता जो शासन चलाने में नाकाम रहे, उन्होंने खुद की राजनीति को बनाए रखने के लिए धर्म और रूढ़ियों के ज़रिए जनता के ध्यान को मुख्य मुद्दों से भटकाने की कोशिश की है.

    वसुंधरा राजे के पिछले कार्यकाल में कुर्सी की पूजा के साथ जो ढोंग प्रदेश में शुरु हुए वे जहालत की हदें पार करते हुए मौजूदा कार्यकाल में विधानसभा में भूतों के होने के दावों तक पहुंच गए. 22 फरवरी को भाजपा के मुख्य सचेतक कालूलाल गुर्जर और नागौर से विधायक हबीबुर्रहमान अशरफी ने सदन के बाहर बकायदा मीडिया के सामने बयान दिया कि विधानसभा में बुरी आत्माओं का साया है. उनका कहना था, ‘आत्माओं की शांति के लिए हवन और पंडितों से भजन करवाने की जरूरत है. इस बारे में मुख्यमंत्री को भी बता चुके हैं. कई सुझाव भी दिए हैं.’

    उधर, संसदीय कार्यमंत्री राजेंद्र राठौड़ ने तो सदन में भूत-प्रेत और आत्माओं की संख्या जांचने के लिए बाकायदा कमेटी बनाने की मांग कर दी. उन्होंने रात 12 बजे तक सदन की कार्यवाही हर हाल में पूरी हो जाने की सलाह भी दी. उनके मुताबिक 12 बजे के बाद परिसर में भूत-प्रेत सक्रिय हो जाते हैं. इस दौरान कई विधायक गोपालन राज्य मंत्री ओटाराम देवासी से झाड़-फूंक के लिए कहते दिखे तो वहीं राठौड़ विधानसभा अध्यक्ष कैलाश मेघवाल को भूतों के इलाज में पारगंत बता रहे थे. हद तो तब हुई जब कालूराम गुर्जर ने विधानसभा में एक तांत्रिक बुलवा लिया. चार घंटे तक सदन के मुआयने के बाद तांत्रिक ने वहां की भूमि में दोष बताते हुए जल्द ही इसका कोई उपाय करने को कह दिया. जबकि हक़ीकत यह थी कि सरकार सदन के आखिरी (दूसरे) सत्र में विपक्ष के सवालों से बचना चाह रही थी. प्रदेश के कई राजनीतिकारों ने इस पूरे मामले को राज्य सरकार का ओछा और शर्मसार करने वाला ऐसा हथकंडा बताया जिसके जरिये सत्र के महत्वपूर्ण समय को बरबाद किया गया.

    लेकिन राजनीति में धर्म का तड़का कुर्सीपूजा और विधानसभा में भूतों तक नहीं रुका. सांवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के इस स्टंट ने प्रदेश के कट्टरवादी लोगों को एक तरह से उकसाने का काम किया. पिछले कुछ वर्षों में भीड़ द्वारा निर्दोष लोगों की बेरहमी से की गई हत्याएं इस बात की छोटी सी बानगी मात्र हैं. इसमें कोई दो राय नहीं कि सदियों से भक्ति-सूफ़ी परंपरा के सिरमौर रहे राजस्थान के माथे पर भाजपा ने कलंक लगाने का काम किया है.

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