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भ्रष्टाचार एक जड़ की तरह-मुख्यमंत्री अशोक गहलोत

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दा एंगल।
जयपुर।
आज भ्रष्टाचार समाज को दीमक की तरह चाट रहा है। जहां देखो वहां हर जगह भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार है। इस भ्रष्टाचार ने पूरे विश्व में अपना जाल बिछा रखा हैं। इसने आज हमारे देश की अर्थव्यवस्था खोखला दिया है। यह किसी भी देश की विकास में सबसे बड़ा बाधक होती है। इसने अपने चंगुल में पूरी दुनिया को फंसा रखा है।

भ्रष्टाचार को रोकना हुआ नामुमकिन

इसका अजगर आज इतना विशाल हो गया कि इसको खत्म करना एक प्रकार से नामुमकिन सा हो गया है। इसी को ध्यान में रखते हुए 31 अक्टूबर 2003 में इसके खिलाफ संयुक्त राष्ट्र के सम्मेलन में प्रस्ताव पारित हुआ था। उसके बाद से हर साल 9 दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय भ्रष्टाचार विरोधी दिवस मनाया जाता है। इसका मुख्य रूप से मकसद इसके बारे में लोगों के बीच जागरूकता पैदा करना है।

 

भ्रष्टाचार का मतलब यह होता कि किसी जायज या नाजायज काम के बदले दिए जाने वाला अनुचित लाभ होता है। यह लाभ किसी भी तरह का हो सकता है आर्थिक और किसी अन्य तरीके से। इसे सीधी भाषा में रिश्वत कहते हैं। जो आज यह देश की सबसे बड़ी समस्या हो गई है। उदाहरण के लिए आप किसी भी आॉफिस में किसी काम के लिए जाते हैं और वहां पर मौजूद कर्मचारी आपसे पैसे मांगता है तो यह रिश्वत है। जबकि सरकार उसको इस तरह के काम करने के लिए तनख्वाह देती है।

रिश्वतखोरी एक समस्या

एक अनुमान के मुताबिक दुनिया भर में हर साल एक ट्रिलियन डॉलर यानी करीब 70 लाख करोड़ रुपये हर साल घूस के तौर पर दिया जाता है। वहीं इसके माध्यम से करीब 300 लाख करोड़ रुपये की हर साल चोरी की जाती है जो दुनिया भर की जीडीपी का करीब पांच फीसदी है।
अगर भ्रष्टाचार की बात आती है तो इसके लिए जितना सरकारी सिस्टम जिम्मेदार है, उतना ही आम आदमी और निजी कंपनियां भी शामिल हैं। कई बार आम आदमी भी झंझट, परेशानी और समय की बचत करने के लिए अधिकारियों की नाजायज मांग को मान लेता है। इस तरह से वह इसको बढ़ावा देता है। इस तरह से इसको अपने आप ही बढ़ावा मिल जाता है।

अशोक गहलोत ने किया ट्वीट

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी अंतरराष्ट्रीय भ्रष्टाचार विरोधी दिवस पर ट्वीट कर कहा कि हमारा यह प्रयास बहुत मजबूत और सुदृढ़ होना चाहिए इस भ्रष्टाचार को रोकने के लिए। हमें सिस्टम में जवाबदेही और पारदर्शिता को बढ़ावा देने की जरूरत है। भ्रष्टाचार आज एक जड़ की तरह हो गया है, क्योंकि यह संस्थानों को कमजोर करता है, लोकतंत्र में कानून और मूल्यों का शासन है।

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