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देशभर में सादगी से मनाया जा रहा ईद-उल-अजहा का त्यौहार

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द एंगल।

जयपुर।

आज देशभर में ईद-उल-अजहा का त्यौहार सादगी के साथ मनाया जा रहा है। कोरोना महामारी की ओर से मुस्लिम धर्मगुरुओं की ओर से सभी लोगों से घरों में ही सोशल डिस्टेंसिंग की पालना करते हुए नमाज अदा करने की अपील की गई। इस मौके पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत समेत देशभर से तमाम नेताओं ने देशवासियों को मुबारकबाद दी है। राष्ट्रपति कोविंद ने आज अपना बधाई संदेश उर्दू में लिखा। इसके साथ ही उन्होंने हिंदी में भी संदेश देते हुए देशवासियों को भाईचारे और त्याग की भावना प्रदान करने वाले त्योहार पर शुभकामनाएं देते हुए कोविड को लेकर भी सतर्क रहने की अपील की।

जयपुर में ईद की रौनक गायब, जैसलमेर में होटल में कांग्रेस विधायकों ने मनाई ईद

राजस्थान की राजधानी जयपुर में ईद के मौके पर बाजार बेनूर नजर आए। यहां लोगों ने अपने घरों में ही ईद की नमाज अदा की और एक-दूसरे को ईद की मुबारकबाद दी। कोरोना महामारी को देखते हुए लोग अपने घरों में रहकर ही ईद मना रहे हैं। वहीं कांग्रेस विधायकों को कल जैसलमेर शिफ्ट कर दिया गया था। इसलिए आज कांग्रेस विधायकों ने जैसलमेर के सूर्यागढ़ होटल में ही ईद मनाई और एक दूसरे को शुभकामनाएं दीं। राजस्थान में सरकार में मंत्री शाले मोहम्मद क्योंकि जैसलमेर के पोकरण विधानसभा क्षेत्र से ही विधायक हैं, लिहाज़ा उनकी भूमिका मेजबान के रूप में रही। उन्होंने सभी विधायकों को ईद की शुभकामनाएं देते हुए ईद की मिठाई भी खिलाई।

जैसलमेर में ईद की नमाज अदा करते कांग्रेस विधायक

धू-अल-हिज्जा की 10 तारीख को मनाई जाती है ईद-उल-अजहा

बता दें ईद-उल-अजहा का त्योहार ईद की नमाज़ के साथ शुरू होता है। सभी मुस्लिम पुरुष मस्जिदों या ईदगाह में ईद की नमाज अदा करते हैं। ईद की नमाज के बाद कुर्बानी का सिलसिला शुरू होता है। हालांकि इस साल कोरोना वायरस के चलते लोगों को अपने घरों में ही ईद की नमाज अदा करने को कहा गया है। इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक धू-अल-हिज्जा की 10 तारीख को बकरीद (Bakrid 2020) मनाई जाती है।

ईद-उल-अजहा पर क्यों दी जाती है बकरे की कुर्बानी ?

इस्लाम धर्म में बकरीद का खास महत्व है। इस्लामिक मान्यताओं के मुताबिक अल्लाह ने हज़रत इब्राहिम की परीक्षा लेने के लिए उनसे उनकी सबसे प्यारी और अज़ीज़ चीज़ की कुर्बानी देने के लिए कहा था। हज़रत इब्राहिम के लिए सबसे अज़ीज़ और प्यारे उनके बेटे हज़रत ईस्माइल ही थे। लेकिन हज़रत इब्राहिम ने बेटे के लिए अपनी मुहब्बत के बजाए अल्लाह के हुक्म को मानने का फैसला किया और अपने बेटे को अल्लाह के लिए कुर्बान करने के लिए तैयार हो गए।

कहा जाता है कि जब हज़रत इब्राहिम के बेटे हज़रत ईस्माइल को इस बारे में पता चला तो वे भी कुर्बान होने के लिए राज़ी हो गए। हज़रत इब्राहिम ने आंखें बंद करके जैसे ही अपने बेटे की गर्दन पर छुरी चलाई तो अल्लाह ने उनके बेटे की जगह दुंबा यानि बकरा भेज दिया। इस तरह उनके बेटे बच गए और दुंबा कुर्बान हो गया। इसके बाद से ही अल्लाह की राह में बकरे की कुर्बानी देने का सिलसिला शुरू हो गया।

सऊदी अरब में ऊंट की कुर्बानी देने की है परंपरा, इस बार स्वास्थ्य मंत्रालय ने लगाई रोक

खास बात यह भी है कि भारत समेत कई मुल्कों में भले ही बकरे की कुर्बानी दी जाती हो लेकिन सऊदी अरब में ऊंट की कुर्बानी देने की परंपरा है। बता दें कि इस बार सऊदी अरब के स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से घातक मिडिल ईस्ट रेस्पेरेट्री सिंड्रोम (मर्स) के खतरे को देखते हुए ईद के अलावा हज के दौरान भी ऊंट की कुर्बानी पर रोक लगा दी है।

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