Home International Culture महर्षि दयानंद सरस्वती जिन्होंने बताया ज्ञान का असली अर्थ

महर्षि दयानंद सरस्वती जिन्होंने बताया ज्ञान का असली अर्थ

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महर्षि

द एंगल।

नई दिलली।

आज देशभर में महर्षि दयानंद सरस्वती की जयंती मनाई जा रही है। महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने अपनी पूरी जिंदगी में देश को जोड़ने का काम किया था। उन्होंने अपने ज्ञान से लोगों को सही राह दिखाकर लोगों को अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ एकजुट किया था। आज उनकी जयंती के ख़ास अवसर पर जानते है महर्षि दयानंद सरस्वती के बारे में।

ज्ञानी वही होता है जो –

महर्षि दयानंद सरस्वती का जन्म 12 फरवरी 1824 को गुजरात के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनका बचपन का नाम मूलशंकर अंबाशंकर तिवारी था। इनके पिता नौकरी किया करते थे। महर्षि दयानंद सरस्वती का जन्म एक अमीर परिवार में हुआ था। इसलिए उनके पास किसी भी चीज़ की कोई कमी नहीं थी। महर्षि दयानंद सरस्वती का कहना था कि ब्राह्मण वहीं होता है जो ज्ञानी हो, अपने ज्ञान से दुसरो का अंधकार दूर कर सके।

दयानंद सरस्वती जी ने जीवनभर वेदों और उपनिषदों का अध्ययन किया था और संसार को उनका ज्ञान भी दिया था। महर्षि दयानंद सरस्वती के अनुसार मूर्ति पूजा व्यर्थ थी निराकार ओमकार में भगवान का अस्तित्व है, यह कहकर उन्होंने वैदिक धर्म को सर्वश्रेष्ठ बताया। दयानंद सरस्वती जी ने 1875 में आर्य समाज की स्थापना की थी इतना ही नहीं महर्षि दयानंद जी ने 1857 की क्रांति में भी अपना बहुमूल्य योगदान दिया था। जिसमें उन्होंने अंग्रेजो से जमकर लोहा लिया था। जिसके बाद अंग्रेजों ने षड्यंत्र रचकर 30 अक्टूबर 1883 को उनकी हत्या कर दी थी।

महर्षि दयानंद सरस्वती ने 21 की उम्र में ले लिया था संन्यास –

महर्षि दयानंद सरस्वतीजी ने अपने जीवन की एक घटना के बाद 21 वर्ष संन्यासी जीवन अपना लिया था और अपना घर छोड़ दिया था। वह जीवन के सत्य को जानना चाहते थे। जिसकी वजह से उन्हें सांसारिक सुख व्यर्थ लगते थे। इसलिए उन्होने विवाह भी नहीं किया था। इस विषय को लेकर अक्सर उनका और उनके पिता का विवाद भी होता था। लेकिन उनकी प्रबल इच्छा शक्ति के आगे उनके पिता को झुकना पड़ा । वे विरोध करने और अपने विचारों को रखने में बचपन से ही प्रबल थे। इसी वजह से उन्होंने अंग्रेजो की हुकुमत का भी विरोध किया और देश को आर्य भाषा के प्रति जागरूक बनाया।

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