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कहां है पीएम नरेंद्र मोदी का आत्मनिर्भर भारत ? विदेशी मदद के सहारे जीती जाएगी कोरोना की जंग?

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फाइल इमेज)

The Angle

जयपुर/नई दिल्ली।

नेहा निराला।

कोरोना महामारी के इस दौर में देश में हालात बेहद गंभीर हो चुके हैं। रोजाना संक्रमण की चपेट में आने वाले लोगों का आंकड़ा 3 लाख को पार कर चुका है। स्थितियों का आंकलन इस बात से भी किया जा सकता है कि देश में मौजूद संसाधन अब कम पड़ने लगे हैं और भारत को दुनिया के सामने हाथ फैलाने को मजबूर होना पड़ रहा है। मानवीयता के नाते समय-समय पर दुनिया के देश आपत्ति में फंसे देशों की मदद की पेशकश जरूर करते हैं, लेकिन हैरानी की बात ये है कि कुछ दिनों तक पीएम नरेंद्र मोदी जिस भारत देश को दुनिया का फार्मेसी बता रहे थे, अब उसे दुनिया के मुल्कों के सामने हाथ फैलाने की नौबत आ चुकी है।

कहा जा रहा है कि मोदी सरकार ने कोरोना महामारी को हल्के में लिया, जिसका खामियाज़ा देशवासियों को अपनी जान देकर चुकाना पड़ रहा है। वहीं जो वैश्विक मीडिया पीएम नरेंद्र मोदी को कुछ समय पहले तक एक आइकॉनिक नेता के रूप में प्रचारित कर रही थी और उन्हें दुनिया का सबसे ताकतवर व्यक्ति बता रही थी, वही मीडिया मोदी सरकार की नीतियों की आलोचना कर रही है।

पीएम नरेंद्र मोदी से पहले पंडित नेहरू ने देखा था भारत को आत्मनिर्भर बनाने का सपना

जानकारी के मुताबिक अपनी गलत नीतियों के कारण मोदी सरकार को देश की 16 साल पुरानी परंपरा मजबूरी में बदलनी पड़ी है, जिसमें भारत ने विदेशी उपहार, दान और मदद नहीं लेने का फैसला किया गया था। हालांकि इससे पहले जब देश आजाद हुआ, उस समय देश का मूलभूत ढांचा विकसित किया जा रहा था। उस समय भी दुनिया के विकसित मुल्कों ने देश की मदद की पेशकश की थी। लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से कहा था कि अगर हमारे देश को आत्मनिर्भर बनना है तो हमें अपने लिए संसाधन खुद ही जुटाने होंगे। उनकी इसी सोच का परिणाम है कि आज देश विकासशील से विकसित राष्ट्र बनने की ओर अग्रसर है।

विपदा के समय खुद दो बार विदेशी मदद लेने से इनकार कर चुकी मोदी सरकार

गौरतलब है कि 16 साल पहले तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने सुनामी संकट के समय फैसला किया था कि भारत अब अपने दम पर अपनी लड़ाई लड़ सकता है। इसलिए किसी विदेशी मदद को नहीं स्वीकार किया जाएगा। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने 1991 में उत्तरकाशी भूकंप, 1993 में लातूर भूकंप, 2001 में गुजरात भूकंप, 2000 में बंगाल चक्रवात और 2004 में बिहार बाढ़ के बाद किसी भी तरह की विदेशी मदद नहीं ली थी। यही नीति पिछले 16 सालों से चल रही थी और भारत ने इसी नीति के चलते उत्तराखंड में 2013 में आई बाढ़, 2005 में कश्मीर के भूकंप के दौरान विदेशी मदद लेने से इनकार कर दिया था।

वहीं खुद मोदी सरकार के कार्यकाल की बात करें तो अपने पिछले कार्यकाल के दौरान सितंबर, 2014 में आई कश्मीर बाढ़ और 2018 में भी भारत ने कोई विदेशी सहायता नहीं ली। जबकि 2018 की बाढ़ के समय तो यूएई ने केरल को 700 करोड़ रुपए की मदद की पेशकश की थी, पर मोदी सरकार ने उसे लेने से इनकार कर दिया था।

विदेश सचिव बोले- पूरी दुनिया एक-दूसरे पर निर्भर

वहीं सरकार ने अपने इस फैसले का बचाव किया है। भारत के विदेश सचिव हर्ष वर्धन श्रृंगला ने कहा कि लोगों की ज़रूरतें पूरी करने के लिए जो भी करना होगा, सरकार करेगी। उन्होंने कहा कि हमने भी लोगों की मदद की है और हमें अब मदद मिल रही है। यह दिखाता है कि पूरी दुनिया एक-दूसरे पर निर्भर है। विदेश सचिव के इस फैसले से पीएम मोदी के आत्मनिर्भर भारत वाले दावे की भी हवा निकल गई है।

पाकिस्तान और चीन ने भी बढ़ाया मदद का हाथ

सबसे ज्यादा गौर करने वाली बात तो ये है कि जो पाकिस्तान अपनी जरूरतों के लिए भी दूसरों पर निर्भर है, वो भी आज मदद का हाथ बढ़ा रहा है। हालांकि मानवता के पहलु से देंखें तो एक सराहनीय पहल कही जा सकती है। लेकिन पाकिस्तान में यूरोपियन यूनियन की राजदूत एंद्रोउला कामिनारा ने ट्वीट कर कहा, ”हमें पाकिस्तान को तहे दिल से शुक्रिया कहना चाहिए कि उसने ईयू से भारत भेजी जा रही मानवीय मदद के लिए उसने एयरस्पेस के इस्तेमाल की तत्काल अनुमति दी।” इस बयान से साफ है कि मोदी सरकार की गलत नीतियों के कारण आज देश पाकिस्तान का अहसान लेने को मजबूर है। वहीं सीमा पर गतिरोध के चलते लंबे समय से चीन के साथ भारत के रिश्तों में तल्खी बनी हुई है। इस बीच चीन ने भी भारत की मदद करने की बात कही है।

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